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गौसे आजम की तालीमात को जिंदगी में उतारने का आह्वान, इस्लाम पर मजबूती से कायम रहने का संदेश

गौसे आजम की तालीमात को जिंदगी में उतारने का आह्वान, इस्लाम पर मजबूती से कायम रहने का संदेश

जलसा-ए-गौसुलवरा में उलमा-ए-किराम ने नेक किरदार, अच्छे अखलाक और नई पीढ़ी की दीनी तरबियत पर दिया जोर

गोरखपुर। तकिया कवलदह रसूलपुर में जलसा-ए-गौसुलवरा का आयोजन अकीदत और एहतराम के साथ किया गया। जलसे में उलमा-ए-किराम ने हजरत शैख अब्दुल कादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैह (गौसे आजम) की जिंदगी, उनकी दीनी सेवाओं, उनकी शिक्षाओं और समाज सुधार से जुड़े उनके संदेशों पर विस्तार से रोशनी डाली। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि बुजुर्गाने दीन की जिंदगी मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण जरिया है। उनकी शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर इंसान अपने ईमान, अमल और किरदार को बेहतर बना सकता है।

जलसे को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता मौलाना जहांगीर अहमद अजीजी ने कहा कि हजरत गौसे आजम रहमतुल्लाह अलैह की पूरी जिंदगी अल्लाह की इताअत, दीन की खिदमत और इंसानों की भलाई के संदेश से भरी हुई है। उन्होंने कहा कि औलिया-ए-किराम ने लोगों को हमेशा नेक रास्ते पर चलने, बुराइयों से बचने और अपने रब से मजबूत रिश्ता कायम करने की तालीम दी। उनकी जिंदगी का अध्ययन करने से इंसान को अपने जीवन में सुधार लाने की प्रेरणा मिलती है।

उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि हम धार्मिक शिक्षाओं को केवल सुनने और बयान करने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाएं। इंसान की पहचान उसके अच्छे किरदार, सच्चाई, ईमानदारी और दूसरों के साथ उसके व्यवहार से होती है। उन्होंने कहा कि अगर व्यक्ति अपने अंदर सुधार पैदा कर ले तो उसका असर उसके परिवार और पूरे समाज पर पड़ता है।

मौलाना जहांगीर अहमद अजीजी ने कहा कि मुसलमान को अपने ईमान की हिफाजत के साथ नेक अमल की भी फिक्र करनी चाहिए। नमाज की पाबंदी, कुरआन की तालीम, बड़ों का सम्मान, छोटों से मोहब्बत, पड़ोसियों के अधिकारों का ख्याल और जरूरतमंदों की मदद जैसे काम इंसान के किरदार को बेहतर बनाते हैं। उन्होंने लोगों से झूठ, बुरे व्यवहार, आपसी विवाद और दूसरी सामाजिक बुराइयों से बचने की अपील की।

उन्होंने खास तौर पर युवाओं और नई पीढ़ी की दीनी तरबियत पर जोर देते हुए कहा कि बच्चों का भविष्य केवल दुनियावी शिक्षा से नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार और सही मार्गदर्शन से भी बनता है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी औलाद की शिक्षा के साथ उनके अखलाक और चरित्र पर भी ध्यान दें। उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही दीन की बुनियादी जानकारी, नमाज की अहमियत, अच्छे व्यवहार और बड़ों के सम्मान की शिक्षा दी जानी चाहिए।

विशिष्ट वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने हजरत गौसे आजम रहमतुल्लाह अलैह की शिक्षाओं और उनके आध्यात्मिक व सामाजिक संदेश पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि औलिया-ए-किराम ने हमेशा लोगों को अल्लाह की इबादत, पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत, अच्छे अखलाक और इंसानियत की खिदमत का रास्ता दिखाया।

उन्होंने कहा कि बुजुर्गाने दीन की जिंदगी में इबादत के साथ-साथ इंसानों की भलाई और समाज की सुधार की भावना भी दिखाई देती है। इसलिए हमें उनकी शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जलसों और धार्मिक कार्यक्रमों की असल खूबसूरती तभी है, जब यहां से मिलने वाला संदेश लोगों की जिंदगी में नजर आए।

कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि आज के दौर में परिवार और समाज के सामने कई चुनौतियां हैं। नई पीढ़ी को सही दिशा देने के लिए घर के माहौल को बेहतर बनाना बेहद जरूरी है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों के साथ मोहब्बत और समझदारी से पेश आएं, उनकी संगत और गतिविधियों पर ध्यान दें तथा उन्हें दीन और अच्छे संस्कारों से जोड़ें।

उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि क्या सही है और क्या गलत, बल्कि अभिभावकों को अपने व्यवहार से भी उनके सामने अच्छा उदाहरण पेश करना चाहिए। घर में अगर नमाज, कुरआन, अच्छे अखलाक, बड़ों का सम्मान और आपसी मोहब्बत का माहौल होगा तो बच्चों की शख्सियत भी उसी के अनुसार विकसित होगी।

उन्होंने समाज में आपसी भाईचारे और इंसानियत को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। कहा कि एक-दूसरे की मदद करना, जरूरतमंदों का सहारा बनना, पड़ोसियों के अधिकारों का ख्याल रखना और समाज में अमन कायम रखने की कोशिश करना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि इस्लामी शिक्षाएं इंसान को अपने रब से जोड़ने के साथ-साथ इंसानों के साथ बेहतर व्यवहार करने की भी तालीम देती हैं।

जलसे के दौरान नात-ए-पाक की महफिल भी सजी। हाफिज रहमत अली निजामी और मुहम्मद दारैन ने नात-ए-पाक का नजराना पेश किया। नात के दौरान जलसे में मौजूद लोगों ने अकीदत का इजहार किया। माहौल में धार्मिक भावनाओं और अकीदत की झलक दिखाई दी। कार्यक्रम का संचालन हाफिज आफताब आलम निजामी ने किया। उन्होंने कार्यक्रम के विभिन्न चरणों को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया।

जलसे में वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य केवल एक कार्यक्रम का आयोजन करना नहीं होना चाहिए, बल्कि लोगों को अपनी जिंदगी में सुधार की ओर ले जाना भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर इंसान अपनी जिंदगी से बुराइयों को निकालने और नेकियों को अपनाने का प्रयास करे तो उसका असर समाज में भी दिखाई देगा।

वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में युवाओं के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। ऐसे में उन्हें सकारात्मक सोच, अच्छी संगत और सही मार्गदर्शन की जरूरत है। परिवार और समाज के जिम्मेदार लोगों को चाहिए कि वे युवाओं के साथ संवाद कायम करें और उन्हें उनकी क्षमताओं के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर दें। साथ ही उन्हें दीन और नैतिक मूल्यों से जोड़े रखें।

जलसे में मौजूद लोगों से अपील की गई कि वे अपने घरों में दीनी माहौल कायम करें और अपनी औलाद की शिक्षा व तरबियत को प्राथमिकता दें। वक्ताओं ने कहा कि जिस समाज के घरों में अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्यों की मजबूत बुनियाद होती है, वह समाज लंबे समय तक मजबूत बना रहता है।

कार्यक्रम के संयोजक हाफिज आरिफ रजा ज्याई ने जलसे में शामिल होने वाले उलमा-ए-किराम, नातख्वानों, मेहमानों और तमाम लोगों का आभार जताया। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग करने वाले सभी लोगों का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि जलसा-ए-गौसुलवरा के आयोजन का उद्देश्य लोगों को बुजुर्गाने दीन की शिक्षाओं से रूबरू कराना और उन्हें नेक जिंदगी गुजारने की प्रेरणा देना है।

उन्होंने कहा कि समाज की बेहतरी के लिए जरूरी है कि हम अपनी नई पीढ़ी को अच्छी तालीम और अच्छे संस्कार दें। उन्होंने लोगों से आपसी मतभेदों को दूर कर भाईचारे को मजबूत करने तथा जरूरतमंदों की मदद करने की अपील की।

जलसे में हाफिज रजी अहमद, मुहम्मद आसिफ, इरशाद, मुर्तजा, चुन्नू समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में मुल्क में अमन-शांति, आपसी भाईचारे, खुशहाली और तरक्की के लिए विशेष दुआ की गई। लोगों ने देश और समाज में शांति, आपसी मोहब्बत तथा नई पीढ़ी के बेहतर भविष्य के लिए भी दुआ की।

जलसा-ए-गौसुलवरा में दिए गए संदेश का केंद्रीय भाव यही रहा कि इंसान अपने ईमान और किरदार को मजबूत बनाए, बुराइयों से बचे, नेक रास्ते पर कायम रहे और अपने आसपास के लोगों के लिए भलाई का जरिया बने। उलमा-ए-किराम ने कहा कि हजरत गौसे आजम रहमतुल्लाह अलैह जैसे बुजुर्गाने दीन की जिंदगी और शिक्षाओं से हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा लेनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि केवल बुजुर्गाने दीन का नाम लेना या उनकी जिंदगी का जिक्र करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी नेक शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारना जरूरी है। जब इंसान अपने अंदर सुधार लाता है, अपने परिवार को बेहतर बनाता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझता है, तभी धार्मिक शिक्षाओं का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है।

इस तरह तकिया कवलदह रसूलपुर में आयोजित जलसा-ए-गौसुलवरा धार्मिक और नैतिक संदेशों के साथ संपन्न हुआ। जलसे में शामिल लोगों ने उलमा-ए-किराम की तकरीरें सुनीं और इस्लाम की शिक्षाओं पर मजबूती से कायम रहने, नेक जिंदगी गुजारने, अच्छे अखलाक अपनाने तथा नई पीढ़ी को दीन और अच्छे संस्कारों से जोड़ने का संदेश लेकर अपने घरों की ओर रवाना हुए।

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