इस्माइलपुर में सजी महफिल-ए-मुस्तफा, सीरत-ए-रसूल के पैगाम से गूंजा काजी जी का मैदान
जलसा-ए-ईद मिलादुन्नबी में उमड़ा अकीदतमंदों का सैलाब, उलमा ने मोहब्बत-ए-रसूल और सुन्नत पर अमल की दी ताकीद
गोरखपुर। इस्माइलपुर स्थित काजी जी के मैदान में जलसा-ए-ईद मिलादुन्नबी का भव्य आयोजन हुआ। जलसे में बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की। नात-ए-पाक, दुरूद-ओ-सलाम और तकरीरों से पूरा मैदान गूंजता रहा। महफिल में पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत, अखलाक और इंसानियत के लिए उनके पैगाम को प्रमुखता से सामने रखा गया। उलमा-ए-किराम ने कहा कि मोहब्बत-ए-रसूल का असल तकाजा यह है कि इंसान अपनी जिंदगी को सीरत-ए-मुस्तफा के मुताबिक ढाले और समाज में अमन, भाईचारे व इंसानियत को मजबूत करे।

जलसे का आगाज कारी शरफुद्दीन मिस्बाही ने कुरआन-ए-पाक की तिलावत से किया। इसके बाद कारी नसीमुल्लाह, मौलाना अली अहमद, हाफिज मिन्हाजुद्दीन और हाफिज फुरकान ने बारगाह-ए-रिसालत में नात-ए-पाक का नजराना पेश किया। नात के दौरान अकीदतमंदों ने दुरूद-ओ-सलाम का नजराना पेश करते हुए अपनी अकीदत का इजहार किया।
मुख्य अतिथि तहरीक उलमा-ए-हिंद के चेयरमैन डॉ. मुहम्मद खालिद अय्यूब मिस्बाही ने मोहब्बत-ए-रसूल के विषय पर विस्तार से तकरीर की। उन्होंने कहा कि हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी जिंदगी इंसानियत के लिए रहमत, अमन, भाईचारे और बेहतरीन अखलाक का मुकम्मल नमूना है। आपकी सीरत में इंसान के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने के लिए व्यापक मार्गदर्शन मौजूद है।

उन्होंने कहा कि सच्ची मोहब्बत-ए-रसूल केवल जुबान से अपने जज्बात का इजहार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक तकाजा पैगंबर-ए-इस्लाम की सुन्नत और सीरत को अपनी जिंदगी में अपनाना है। जब इंसान अपने व्यवहार में सच्चाई, ईमानदारी, रहमदिली, सब्र और दूसरों के अधिकारों का ख्याल रखता है, तो यही मोहब्बत-ए-रसूल का व्यावहारिक रूप बनती है।
डॉ. खालिद अय्यूब मिस्बाही ने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम ने समाज के हर वर्ग के अधिकारों और सम्मान की शिक्षा दी। पड़ोसियों के हक, जरूरतमंदों की मदद, कमजोरों के साथ रहमदिली, सच्चाई और इंसाफ जैसी शिक्षाएं आज भी समाज के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन शिक्षाओं को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में अपनाया जाए तो समाज में नफरत और दूरी कम होकर अमन और भाईचारे को बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने युवाओं पर विशेष जोर देते हुए कहा कि नई पीढ़ी को सीरत-ए-मुस्तफा का अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवाओं के चरित्र निर्माण और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाने में सीरत-ए-रसूल की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। अभिभावकों से भी बच्चों को अच्छे संस्कार देने और पैगंबर-ए-इस्लाम के आदर्श जीवन से परिचित कराने की अपील की।
अध्यक्षता करते हुए मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी ने इश्क-ए-रसूल की अहमियत पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि मुसलमान की जिंदगी में पैगंबर-ए-इस्लाम की मोहब्बत को बुनियादी स्थान हासिल है। यह मोहब्बत इंसान के किरदार को संवारने और उसे नेक रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि सीरत-ए-मुस्तफा का अध्ययन केवल जानकारी हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का जरिया है। पैगंबर-ए-इस्लाम के अखलाक, सब्र, रहमदिली, सच्चाई और इंसाफ से प्रेरणा लेकर हर व्यक्ति अपने परिवार और समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। उन्होंने युवाओं से खास तौर पर सीरत-ए-मुस्तफा को पढ़ने और उसके संदेश को अपनी व्यावहारिक जिंदगी में उतारने की अपील की।
जलसे के दौरान बारगाह-ए-रिसालत में दुरूद-ओ-सलाम का नजराना भी पेश किया गया। नातख्वानों की आवाज से माहौल रूहानी नजर आया। अकीदतमंदों ने पूरे अदब व एहतराम के साथ नात-ए-पाक सुनी और दुरूद-ओ-सलाम पढ़ा। इस दौरान मुल्क में अमन, खुशहाली, तरक्की और आपसी भाईचारे के लिए दुआ की गई।
कार्यक्रम का संचालन हाफिज रहमत अली निजामी ने किया। उन्होंने अपने प्रभावी अंदाज में जलसे की विभिन्न गतिविधियों को आगे बढ़ाया। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने उलमा-ए-किराम की तकरीरों को गौर से सुना और सीरत-ए-मुस्तफा के संदेश को अपनी जिंदगी में अपनाने का संकल्प लिया।
जलसे में हाफिज मो. मोहसिन कादरी, हाफिज फुरकान, हाफिज काशिफ अली, हाफिज अमन, हाफिज जैद, हाफिज अरीब, शारिक, हाफिज मो. मिन्हाजुद्दीन, मिट्ठू, इबरत, अकरम, शाबान खान, सादिक कलीम, गोलू, मौलाना अबुल कलाम, कारी अनस नक्शबंदी, मो. इरफान, गुलाम शरफुद्दीन सामानी, शारिब, गुफरान सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
अंत में दुआ के साथ जलसा संपन्न हुआ। उलमा ने लोगों से पैगंबर-ए-इस्लाम की सीरत और सुन्नत को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने तथा अपने घर-परिवार और समाज में प्रेम, सद्भाव, इंसानियत और भाईचारे को बढ़ावा देने की अपील की।



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