हजरत उमर ने पूरी जिंदगी इस्लाम का परचम बुलंद करने में लगा दी : शिफा खातून

तुर्कमानपुर में महिलाओं की संगोष्ठी

गोरखपुर। रविवार को मकतब इस्लामियात तुर्कमानपुर में महिलाओं की 33वीं महाना संगोष्ठी हुई। जिसमें मुसलमानों के दूसरे खलीफा हजरत सैयदना उमर रदियल्लाहु अन्हु की जिंदगी व सीरत पर रोशनी डाली गई।

मुअज्जमा कुरैशी व शिफा खातून ने कहा कि हजरत उमर दस खुशनसीब सहाबा में से हैं जिन्हें पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुनिया में ही जन्नत की खुशखबरी अता फरमाई है। हजरत उमर ने पूरी जिंदगी इस्लाम का परचम बुलंद करने में लगा दी। हजरत उमर ने
हिजरी इस्लामी कैलेंडर का निर्माण किया। हजरत उमर असाधारण इच्छा शक्ति, बुद्धि, राजनीतिक, निष्पक्षता, न्याय और गरीबों और वंचितों लोगों के लिए देखभाल के लिए अच्छी तरह से जाने जाते हैं।

मुख्य वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि हजरत सैयदना उमर के बारे में यूरोपीय लेखकों ने कई किताबें लिखी हैं तथा ‘उमर महान’ की उपाधि दी है। प्रसिद्ध लेखक माइकल एच. हार्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दि हन्ड्रेड’ में हजरत उमर को शामिल किया है। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक शाम काबा के पास जाकर अल्लाह से दुआ की कि या अल्लाह उमर को या अबू जहल दोनों में से जो तुझको प्यारा हो हिदायत दे। यह दुआ हजरत उमर के हक में कबूल हुई। हजरत उमर इस्लाम में दाखिल हो गये। मुसलमानों में खुशी की लहर दौड़ गई। इस्लाम लाने पर हजरत उमर ने ऐलान किया कि अब सब मिल कर काबा शरीफ में नमाज पढ़ेंगे।

कुरआन-ए-पाक की तिलावत सना खान ने की। नात-ए-पाक खुशी, सानिया व उम्मे ऐमन ने पेश की। संचालन मुबस्सिरा कुरैशी ने किया। अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर मुल्क में अमन की दुआ मांगी गई। संगोष्ठी में ज्या वारसी, जिक्रा शेख, अख्तरुन निसा, शबाना खातून, रजिया, अस्गरी खातून, आस्मां खातून, तस्मी, फलक, नूरी, नूर अज्का, आलिया, खुशी नूर, मुस्कान, तैबा नूर आदि मौजूद रहीं।

अल्लाह इनाम से नवाजे तो शुक्र अदा करें : हाफिज रहमत अली

अल्लाह अपने नेक बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता : अनस नक्शबंदी

तुर्कमानपुर व गोरखनाथ में दर्स-ए-कुरआन

गोरखपुर। मदरसा रजा-ए-मुस्तफा तुर्कमानपुर व जामिया अल इस्लाह एकेडमी नौरंगाबाद गोरखनाथ में साप्ताहिक दर्स-ए-कुरआन (व्याख्यान) के तहत सूरह कौसर पर रोशनी डाली गई।

मुख्य वक्ता हाफिज रहमत अली निजामी ने बताया कि सूरह कौसर पवित्र कुरआन की 108वीं व सबसे छोटी और अत्यंत महत्वपूर्ण सूरह है। यह सूरह मक्का में नाजिल (अवतरित) हुई। इसमें केवल 3 आयतें हैं, लेकिन इसका आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व बहुत बड़ा है। यह सूरह पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ढांढस बंधाने और अल्लाह की असीम कृपा को दर्शाने के लिए नाजिल हुई। यह सूरह सिखाती है कि जब अल्लाह आपको इनाम से नवाजे, तो उसका शुक्र अदा करें। दूसरी आयत में अल्लाह आदेश देता है कि ‘ऐ महबूब अपने रब के लिए नमाज पढ़ो और कुर्बानी करो’। अंतिम आयत में स्पष्ट है कि जो पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम या अल्लाह के नेक बंदों से नफरत करते हैं, वे खुद अल्लाह की रहमत से वंचित हो जाते हैं और उनका नामोनिशान मिट जाता है।

विशिष्ट वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने बताया कि सूरह कौसर सिखाती है कि चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आए, इंसान को सब्र रखना चाहिए, केवल अल्लाह की इबादत करनी चाहिए और उसी के लिए कुर्बानी देनी चाहिए। मुश्किल समय में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वह अपने नेक बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता।

अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर भाईचारे की दुआ मांगी गई। दर्स-ए-कुरआन में आयशा खातून, तानिया अख्तर, सना फातिमा, फिजा खातून, शालिबा, मुबस्सिरा, आस्मा खातून, नूरजहां, सानिया, अदीबा सहित तमाम इस्लामी बहनों की सहभागिता रही।

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